Inspirational Stories-7-ध्यान लगाना क्यों जरूरी है

 मोटिवेशनल स्टोरी-7- के इस चैप्टर (chapter ) में आपका स्वागत है, इस स्टोरी में हम जानेंगे कि ध्यान से क्या फायदा है ? इससे पहले जो 1 से 6 motivational  स्टोरी पब्लिश्ड किए गए हैं उनको भी पढ़ कर आप अच्छी खासी जानकारी ले सकते और अपने जीवन में अच्छे बदलाव ला सकते हैं. 


ध्यान लगाना क्यों जरूरी है- 



अधिकतर लोग यही पूछते रहते हैं कि भाई बड़े-बड़े लोग जो ज्ञानी लोग हैं वह यह क्यों कहते हैं कि ध्यान लगाओ ,भगवान का ध्यान लगाओ इससे मुक्ति मिलेगी. जबकि साधारण लोगों का यह मानना है कि यह सब चीजें बेकार हैं. उनका यह मानना रहता है कि यह सब समय की बर्बादी और बेवजह का काम है. ऐसा सोचकर , तथा यह कहकर अपने दैनिक जीवन के काम में लगे रहते हैं और उस दैनिक जीवन के काम को ही  वह अपना कर्म मानते हैं. और इस तरह का कर्म करते हुए वह अपने आप को काफी उत्तम तथा श्रेष्ठ समझते, खास करके उस व्यक्ति के मुकाबले जो ध्यान, साधना इत्यादि में लगा रहता है. 


आपने अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार हर कोई श्रेष्ठ और उत्तम कार्य करता है, कोई यह सोचकर काम नहीं करता है कि वह जो कर रहा है वह खराब है ,वह अच्छा समझ कर ही करता है. लेकिन उसके द्वारा किए गए काम हो सकते हैं कि उसके नजर में अच्छे हो, लेकिन उसके परिवार, रिश्तेदारी, या अगल-बगल के लोगों को उनके काम अच्छे नहीं लग सकते हैं या अच्छे लग भी सकते हैं. अर्थात दोनों तरह की बातें हो भी सकती हैं या नहीं भी हो सकती है, क्योंकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनको आपका काम ना अच्छा लगता है ना खराब लगता है बिल्कुल उदासीन लगता है तो इस तरह का भी कभी कभी कभार की बातें भी आ जाती है. इसीलिए कहा गया है कि दोनों तरह की बातें हो सकती हैं अर्थात नहीं भी हो सकती है. 


तो कुल मिला जुला कर जो भी इंसान अपने बुद्धि विवेक से सोच कर जो भी काम करता है उसकी इस प्रकार से रिजल्ट लोगों के thinking के रूप में सामने आते हैं. 


1. या तो कुछ लोगों को आपकी बातें या काम खराब लगेगी और उनमें से कुछ लोगों को बहुत ही बुरी लगेंगे

2. या फिर कुछ लोगों को आपकी काम या बातें अच्छी लगेगी और उनमें से भी कुछ लोगों को बहुत ही अच्छी लगेगी 

3. कुछ लोगों में ऐसे लोग भी होंगे जिनको ना तो आपकी काम अच्छी लगेगी ना बुरी 

लगेगी


 तो तमाम तरह की बातें चली आती है. किसी काम का लोगों को पसंद आना आना या न आना यह किसी भी इंसान का अपना व्यक्तिगत राय. या यूं कह लें कि उनका अपना सोच या नजरिया या उनका अपना व्यक्तिगत मैटर हो जाता है. इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता है. आप कोई भी काम करें और जबरदस्ती लोगों से उसकी वाहवाही लूटे यह सही नहीं है. और अगर इस तरह का हरकत आप या कोई करता भी है तो उसे नितांत मूर्ख माना जाता है. 

और इस दुनिया में कोई नहीं चाहता है कि लोग उसे मूर्ख कहे इसी वजह से कोई कुछ कहता नहीं है. क्योंकि यह पब्लिक पब्लिक को किसी भी बात पर अपना राय देने का हक होता है कोई इसे क्रोध के रूप में देता है तो कोई प्रेम के रूप में देता है तो कोई उदासीन भाव से देता है. 

वैसे भी अगर आपकी बात बहुत लोगों  को पसंद नहीं आ रही है तो आप कर भी क्या सकते हैं, आप थोड़ा बहुत उसमें सफाई देकर या अपनी बातों को एडिट करके कुछ लोगों को तो समझा सकते हैं लेकिन बहुतों को नहीं, उसमें भी अगर कुछ लोग समझदार हुए तो हो सकता है कि आपकी बात समझ जाए, लेकिन उसी में अगर ज्यादातर लोग मूर्ख हुए तो हो सकता है कि वह समझे ही ना. 


इसीलिए तो कहा गया है कि हर किसी को ,हर चीज, वह भी हर समय ,समझाया नहीं जा सकता है. 

क्योंकि इस दुनिया में ज्ञानी कम और अज्ञानी ज्यादा है. और इस बात से भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि खुद को ज्ञानी मानने वाले ही अज्ञानी ज्यादा है. 

कलयुग में यही तो गीता में कहा गया है, कि ज्यादातर अज्ञानी ही होंगे और इस तरह के अज्ञानी लोग अपने आप को ज्ञानी ही समझेंगे, और इस तरह के अज्ञानी लोगों को अगर आप जब कुछ ज्ञान की महत्वपूर्ण बातें सिखाने यह समझाने जाएंगे तो वह कुछ सीखने के बजाय आपको सिखाने ही लगेंगे . और कुछ नहीं समझेंगे वह कुछ समझना भी नहीं चाहते हैं वह केवल अपने अज्ञान को समझना चाहते हैं. 

अपने अज्ञान का प्रमाण देने के लिए वह बार-बार अब डिग्री और तमाम तरह की उपलब्धियों को भी दिन आएंगे जिससे यह साबित हो जाएगा कि वह वास्तव में अज्ञानी ही है. 


उसे आप या कोई भी कितना भी समझाए की वास्तव में ज्ञान का कोई अंत नहीं है, लेकिन वह शायद ही आपका बात माने वह बस यही कहता रहेगा कि मैंने बहुत जीवन भर मेहनत किया है और जीवन भर पढ़ाई की है फिर जाकर इस मुकाम पर पहुंचा हूं इसलिए मैं तो ज्ञानी होने का प्रबल दावेदार हूं. 

इस तरह से आप खुद सोचिए कि इस तरह के लोगों को ज्ञान और बुद्धि की बातें कैसे कोई सिखा सकता है या समझा सकता है. 


उपयुक्त  बातों से यही निष्कर्ष निकलता है कि अगर आप कोई भी काम करते हैं, यही तीन बातें उभर कर सामने आती है जो अभी आप हमने ऊपर कही है अर्थात 


1. या तो कुछ लोगों को आपकी बातें या काम खराब लगेगी और उनमें से कुछ लोगों को बहुत ही बुरी लगेंगे

2. या फिर कुछ लोगों को आपकी काम या बातें अच्छी लगेगी और उनमें से भी कुछ लोगों को बहुत ही अच्छी लगेगी 

3. कुछ लोगों में ऐसे लोग भी होंगे जिनको ना तो आपकी काम अच्छी लगेगी ना बुरी 

लगेगी 


इस तरह से अगर आप उन लोगों को समझाएं जाएं तो यह ठीक नहीं है, वैसे समझाना या ज्ञान देना कोई खराब चीज नहीं है लेकिन जबरदस्ती का समझाना और ज्ञान देना हितकर नहीं माना गया है और यह किसी के लिए भी सही नहीं हो सकता है न समझाने वाले के लिए ही  ना समझने वाले के लिए ही क्योंकि उसमें कहीं ना कहीं खतरा उत्पन्न  होने लगता है. 

वैसे फिर भी आप चाहे तो चांस ले सकते हैं लेकिन उसमें भी एक कंडीशन होनी चाहिए समय स्थिति के अनुसार देखते हुए और case को देखते हुए व्यक्ति विशेष को देखते हुए आप उसमें कई बार समझाने -बुझाने का काम कर सकते हैं. 

यहां पर कई बार समझाने का मतलब बस यही था कि अगर मान लीजिए कि सामने वाला आपका भाई -बंधु निकल गया और वह काफी हितकर इंसान है या आपके परिवार का ही निकल गया या अन्य रिश्तेदार निकल गया जो काफी हितकर और सज्जन इंसान है लेकिन किसी कारणवश मानसिक उलझन और तनाव में फंसा हुआ है तो उसमें आपका कर्तव्य बनता है कि आप उसके पास जाकर उसकी स्थिति से उबारने और उसे स्वस्थ मार्ग पर वापस लाने का भरसक प्रयास करें  इसके लिए आप कई बार प्रयास भी करें तो भी कम है क्योंकि वह सच्चा और सज्जन इंसान है इसलिए उसके लिए कुछ भी करने को आप अंदर से अर्थात अंतरात्मा से भाव उत्पन्न होते हैं, और ऐसे भाव को हमें दबाना भी नहीं चाहिए. बल्कि उस भाव पर अपना आचरण प्रस्तुत करते हुए उस सज्जन व्यक्ति को उसके मानसिक और खराब दशा से उबारने का प्रयास करना चाहिए. 


क्योंकि वह सज्जन और हितकारी व्यक्ति कभी हमारे जीवन से जुड़ा था और आज वह परेशान है इसलिए हमें उसकी स्थिति से उबारना ही पड़ेगा भले ही इसके बदले में हमें थोड़ा क्षति क्यों न उठानी पड़े चाहे वह मानसिक क्षति हो या शारीरिक क्षति हो या आर्थिक क्षति हुई या इनमें से सभी ही क्यों ना हो सब मंजूर होगा. क्योंकि यह साधारण केस  या स्थिति नहीं है, बल्कि यह किसी खास व्यक्ति और खास स्थिति का केस है इसलिए इसमें भी हमें साधारण रवैया न अपनाते हुए एक सुलझा हुआ सोच विचार हुआ रवैया अपनाना होगा ताकि उस व्यक्ति विशेष को उसकी खराब स्थिति से छुटकारा दिलाया जा सके और उसका जीवन भी मधुर में बनाया जा सके. 


लेकिन यहां तो प्रश्न यह उठता है कि एक अज्ञानी व्यक्ति को अगर रोगी माना जाए तो अज्ञानी व्यक्ति ज्ञानी व्यक्ति के मुकाबले ज्यादा बीमार दिखता है और ज्यादा बीमार व्यक्ति को औषधि की आवश्यकता ज्यादा पड़ती है इसलिए औषधि तो ज्यादा रूप से अज्ञानी को ही देना चाहिए अर्थात बुद्धि विवेक और समझदारी रूपी जो ज्ञान है जो औषधि है उसे अज्ञानी व्यक्ति को ही देना चाहिए पहले और वह भी ज्यादा मात्रा में ताकि उसका अज्ञान रूपी रोग नष्ट हो सके, और वह सुख में जीवन जी सकें. 


जब व्यक्ति काफी सज्जन और हितकारी है और वह किसी समय परेशान है तो सज्जन और हितकारी व्यक्तित्व ज्ञानी  है, अर्थात उसमें रोग की मात्रा बहुत ही कम है, अर्थात उसको औषधि देने की उतनी भी बहुत ज्यादा अर्जेंट जरूरत नहीं है. 


इसका उत्तर यह है कि- 

वह व्यक्ति जो ज्ञानी और समझदार है तथा सज्जन है, उसमें रोग की मात्रा कम है , इसलिए उसे अगर औषधि ना भी दिया जाए तो भी परेशानी का बात नहीं है. क्योंकि वह ज्ञानी है, समझदार है और सज्जन भी व्यक्ति है. जो प्रश्न पूछा गया है उसका मतलब तो इतना ही निकलता है. 

लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कभी-कभी ज्ञानी, समझदार और सज्जन व्यक्ति भी अज्ञान और मूर्खता की भयंकर चपेट में आ जाते हैं और यह कभी भी हो सकता है किसी के साथ भी हो सकता है. यदि शीघ्र ही उस अचानक रोग का उपचार उस व्यक्ति के लिए नहीं किया गया तो वह उसके लिए अत्यंत विनाशकारी हो सकता है इसलिए ऐसे रोगी को तुरंत इलाज देना चाहिए. इलाज का मतलब तो आप लोग समझ ही गए होंगे. 

जी हां बिल्कुल आप सही सोच रहे हैं यहां पर इलाज किसी दवा का नहीं देना है बल्कि बुद्धि -विवेक और समझदारी का इलाज उनको देना है. 


इसलिए हमें इतना कुछ सोचकर- विचार कर हम उसके साथ अच्छा व्यवहार करते हुए उसको उसकी स्थिति से उबारना चाहिए. 


गौतम बुद्ध ने कहा था कि " इस संसार में दुख है और इस दुख का कारण है अज्ञान ,शेष  दुख तो मात्र छाया मात्र है" 


चुकी बात बहुत आगे निकल गई है इस वजह से मेन पॉइंट क्या था यह हो सकता है कि आपके दिमाग से निकल गया हो इस वजह से मैं वह चीज फिर से यहां पर लिख रहा हूं ताकि मेन पॉइंट जो है वह आपके दिमाग में आ सके और फिर मैं उस पर चर्चा करता हूं. 


main point यह था 



ध्यान लगाना क्यों जरूरी है- 


अधिकतर लोग यही पूछते रहते हैं कि भाई बड़े-बड़े लोग जो ज्ञानी लोग हैं वह यह क्यों कहते हैं कि ध्यान लगाओ ,भगवान का ध्यान लगाओ इससे मुक्ति मिलेगी. जबकि साधारण लोगों का यह मानना है कि यह सब चीजें बेकार हैं. उनका यह मानना रहता है कि यह सब समय की बर्बादी और बेवजह का काम है. ऐसा सोचकर , तथा यह कहकर अपने दैनिक जीवन के काम में लगे रहते हैं और उस दैनिक जीवन के काम को ही  वह अपना कर्म मानते हैं. और इस तरह का कर्म करते हुए वह अपने आप को काफी उत्तम तथा श्रेष्ठ समझते, खास करके उस व्यक्ति के मुकाबले जो ध्यान, साधना इत्यादि में लगा रहता है. 


तो हमारे कहने का मतलब यही था यहां पर की जो लोग अज्ञान वस अपने मूर्ख कार्यों को ही अपना कर्म समझते हैं ऐसे अज्ञानी लोग इस जीवन से कभी भी छुटकारा नहीं पा सकते हैं. ऐसा नहीं है कि दैनिक जीवन का काम करना कर्म नहीं है लेकिन कर्म का ही वह बड़ा हिस्सा है ऐसा नहीं है यह बिल्कुल साधारण से भी साधारण चीज होता है जिसको कि आप कर्म कह भी सकते हैं और अगर नहीं भी कहेंगे तो भी कोई बड़ी बात नहीं है . 


क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि कर्म का मतलब यज्ञ से होता है और यज्ञ का मतलब ध्यान और साधना से होता है और यही यह ध्यान और साधना आपको आराधना के पथ पर ले जाती है, और उसी आराधना की वजह से आपको भगवान के दर्शन मिलते हैं और भगवान का दर्शन मिलने के बाद ही उनके दरबार में प्रवेश मिलता है और जैसे ही उनके दरबार में प्रवेश मिल जाता है आप हमेशा हमेशा के लिए इस मरने जीने का जो चक्र है उससे मुक्ति पा जाते हैं अर्थात परम गति को प्राप्त हो जाते हैं और भगवान के सदृश्य  ही हो जाते हैं अर्थात भगवान ही आप हो जाते हैं. 


अब लिखने के लिए मैंने सब कुछ लिख दिया है लेकिन अगर कोई इसे समझना ही नहीं चाहे इसमें कोई क्या कर सकता है. किसी चीज का समझना ,नसमझना यह व्यक्ति विशेष पर ,उसके मनोभाव पर इत्यादि बहुत से कारणों पर डिपेंड करता है कि वह वास्तव में चाहता क्या है ? उसे वही मिलता है जो वह चाहता है. 


अगर किसी को भौतिक दुनिया ही अच्छी लगती है जैसे- पत्नी का साथ, पत्नी का शारीरिक संबंध, दूसरी स्त्रियों का भी शारीरिक संबंध, भोग -विलास, दारु शराब, केवल स्वादिष्ट भोजन ही, लड़ाई झगड़ा, मारकाट, क्रोध की भावना..... इत्यादि. 

तो उसमें कोई क्या कर सकता है. उसको इस तरह की चीजें अच्छी लग रही है क्योंकि उसने अपने आपको ऐसा बनाया ही है उसका मनोभाव ही ऐसा है. और जब तक इस तरह का मनोभाव है तब तक वह तामसिक या राजसिक प्रवृत्ति का है. और जिसके अंदर इस तरह का भाव रहता है उसका अगला जन्म फिर होना ही है और जब तक जन्म होगा तब तक मृत्यु भी होगा. क्योंकि जन्म लेने वाले व्यक्ति का मृत्यु निश्चित है , और मृत्यु पाने वाले व्यक्ति का जन्म भी निश्चित है. इस तरह वह हर बार जन्म और मृत्यु के चक्र में कई वर्षों तक या यूं कहें कि कई सदियों तक या यूं कहें कि कई युगों तक उलझा रहेगा और हमेशा हमेशा दुख भोक्ता रहेगा. 

क्योंकि वह व्यक्ति खुद ही इसमें फंसना चाहता है और दुखी होना चाहता है क्योंकि उसे यह दुख ही उसको चरम सुख की तरह लग रहा है. अब ऐसे अज्ञानी मूर्खों का क्या किया जा सकता है. 

अब यह प्रश्न उठता है की क्या इनको कभी अपने दुख से मुक्ति नहीं मिलेगी? 

उत्तर- इसका उत्तर यही है कि इनको अपने दुख से मुक्ति मिलेगी लेकिन काफी समय लग जाएगा. जिसे यह व्यक्ति सुख समझकर और ना ही सुख बल्कि चरम सुख समझकर आनंद ले रहा है जब उसी से बहुत समय के बाद इसे परेशानी समझ में आने लगेगी तो यह व्यक्ति भी इससे मुक्ति पाना चाहेगा क्योंकि तब तक वह समझ गया होगा कि वास्तव में यह चीज मजे वाली नहीं है बल्कि दुख देने वाली है, इसे छोड़ देना ही उचित होगा, अब छोड़ने के लिए वह प्रयास करेगा अब जब प्रयास करना वह शुरु कर देगा तो धीरे-धीरे उसका अज्ञान मिटने लगेगा, और जब उसका अज्ञान मिटकर खत्म हो जाएगा तो वह भी साधना के पथ पर चलने लगेगा और जब वह साधना करता हुआ आराधना करने लगेगा तो उसे भी भगवान के दर्शन मिलेंगे और वह मोक्ष को प्राप्त होगा. लेकिन यह सब जितना सुनने में सरल लगता है वाकई में इन सब का होना और उस होने वाली वाली चीज को झेलना काफी कठिन है. 

एक चरम अज्ञानी व्यक्ति जिसको अज्ञान ही चरम सुख लगता है उसको ज्ञानी होने में बहुत समय लगता है. कभी कभार ऐसा हो जाता है कि चरम अज्ञानी व्यक्ति अचानक से ज्ञानी हो जाए . यह तभी होता है जब भगवान की उस पर असीम कृपा रहे.


अब तो आपको समझ में ही आ ही गया होगा कि ध्यान लगाने से क्या फायदा होता है और ध्यान ना लगाने से क्या नुकसान है यह आपको समझ में आ गया ही होगा. 

इसके साथ साथ यह भी समझ में आ गया होगा कि ज्ञानी कौन है और अज्ञानी कौन है. मूर्ख कौन है और महा मूर्ख कौन है. 





कंक्लुजन- आप अपने दैनिक जीवन से जुड़े रहे, साथ में अध्यात्म का भी ज्ञान प्राप्त करें और ज्ञान प्राप्त करके उसे जीवन में उतारे, ताकि भौतिक जीवन के साथ -साथ आध्यात्मिक जीवन भी साथ चलता रहे, इससे आप भौतिक जीवन भी अच्छा जी सकेंगे और आध्यात्मिक जीवन भी और आपके उद्धार भी होता रहेगा, आपके परिवार वाले भी खुश रहेंगे और आप भी खुश रहेंगे. इसलिए घर परिवार से जुड़े होने के साथ-साथ, रुपए पैसे कमाने के साथ-साथ, धर्म का ज्ञान अर्थात अध्यात्म का ज्ञान भी प्राप्त करें और अपना उद्धार करें तथा अपने प्रियगणों  का भी उद्धार करें.


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