Inspirational Stories-4--दान देना चाहिए या नहीं देना चाहिए

आपने अधिकत्तर अपने दैनिक जीवन में देखा होगा की लोग भिक्षा मांगते है ,और उसी से अपना जीवन यापन करते है। इनका जीवन यापन दुसरो के दिए दान-धन पर ही रहता है। 

भिक्षा मांगने वालो को आपने रेलवे स्टेशनो ,बस स्टेशनो ,मंदिरो  ....तथा इधर -उधर  भीड़ वाले क्षेत्रो में तो देखा ही होगा। ये लोग प्रायः इन्ही जगहों पर अधिकत्तर मिलते है. 



जब ये लोग दुसरो से भिक्षा  मांगते है तो कुछ लोग इन लोगो को भिक्षा दे देते है , भिक्षा के रूप में वे धन   ( मामूली धन जैसे १,२,३,...... १० रुपये तक उससे ज्यादा नहीं ,बहुत काम ही ऐसे लोग होते है ,जो इससे थोड़ा ज्यादा दे देते है , अब यहाँ पर यह नहीं कहा जा रहा है की जयदा देने वाले अच्छे लोग है और काम देने वाले उतने अच्छे नहीं है , ऐसा यहाँ बिलकुल भी नहीं कहा जा रहा है ,इसकी भी चर्चा की जा जाएगी लेकिन अभी नहीं। इसकी चर्चा  आगे की जाएगी। )

दे देते है, वही कुछ लोग दान - दीक्षा में  अन्न देते है ,कुछ लोग  वस्त्र भी देते है , कुछ लोग अन्न  और वस्त्र दोनों देते है,वही कुछ लोग ऐसे भी होते है जो अन्न ,वस्त्र तथा धन। .इत्यादि सब कुछ देते है. 

लेकिन अभी फिलहाल यह प्रश्न नहीं है की लोग दान में क्या देते है ? फिलहाल प्रहण यह है की लोग दान देते ही क्यों है ?क्या इसे दिया जाना उचित है। 

हम यहाँ एक एक कर चीज़ो को समझेंगे। 

पहले हम  जानेगे की लोग क्या सोचकर दान देते है। 

1 जब कोई ब्यक्ति किसी से कुछ मांगता है तो कुछ लोगो को उनपर (भिक्षा मांगने वाले पर ) दया आ जाती है इस वजह से वे दान दे देते है। क्योकि वे दयालु स्वभाव के होते है. 

२. कुछ लोग दान देने अपना कर्तब्य समझते है और ऐसा भाव रखकर वे दान देते  है। 

3 . कुछ लोग दान देना पुण्य है ऐसा भाव - विचार  रखकर  दान देते है। 

4.  कुछ लोग अपने ज़िन्दगी में बहुत पाप किये रहते है उस पाप से मुक्ति पाने के लिए दान देते है.क्योकि पापी ब्यक्ति अपने जीवन में परेशां हो जाता है ,और जब वह अपनी परेशानी से ऊब जाता है तो किसी ग्यानी ,महात्मा  का सहारा लेता है ,और जब वह ग्यानी महात्मा उस पापी ब्यक्ति का मार्ग दर्शन करते हुए ,उसे बताता है की दान देने से तुम्हारा पाप कर्म घटेगा और पुण्य कर्म बढ़ेगा और इसी पुण्य कर्म से तुम्हे तुम्हारे दैनिक जीवन की परेशानी से मुक्ति  भी मिलेगी , ऐसा शुद्ध ज्ञान पाकर ही वह ब्यक्ति दान देता है। 

5 . कुछ लोग दान देना अपनी शान समझते है ,ऐसे लोग ज्यादातर वही लोग होते है जो अज्ञानी होते है। और झूठी शान के लिए दिखावा करते है।  यह लोग ऐसा करके लोगो को और समाज को एक सन्देश देना चाहते है की देखो  मै  कितना  बड़ा आदमी हु। ऐसे  मुर्ख लोग परम अज्ञानी होते है और ज्यादातर यह फिल्म इत्यादि देखकर ही सीखते है और फिर उसी के अनुसार आचरण करते है। 

6. कुछ लोग इस वजह से दान देते है की उन्होंने सुन रखा होता है की दान देने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ,इसी लालच में वे दान देते है। 

दान देने से पुण्य कर्म होता है और स्वर्ग की इच्छा करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति  भी होती है ,परिणामस्वरूप ब्यक्ति स्वर्ग में जाकर नानाप्रकार के दुर्लभ सुख भी भोगता है किन्तु जैसे ही उसके पुण्य कर्म क्षीड़ हो जाता है अर्थात ख़त्म हो जाता है ,वैसे ही उसे पुनः जन्म लेना पड़ता है। यानी जहा से चले थे फिर वही पहुंच गए। अर्थात मर जाने के बाद फिर जन्म और फिर वही दुःख और परेशानी , यानी फिर वही जन्म मरण के चक्कर में फास गए. 

वैसे अगर आपको यही जन्म -मरण का चक्र ,दुःख और परेशानी अच्छी लगती है और इसी को आप जीवन मानते है और इसी में रहना चाहते है और इससे आगे आप न कुछ जानना चाहते और न समझना तो फिर ठीक है. 

क्योकि इस सोच और समझ को कोई नहीं बदल सकता है। क्योकि एक अज्ञानी ब्यक्ति जब अपने अज्ञान को ही ज्ञान समझकर ठान लेता है और उस अज्ञान को  ही अपने जीवन में उतारने  के हर पल तुरंत तैयार है, तो ऐसे ब्यक्ति को कोई साधारण इंसान या कोई साधारण ग्यानी -महात्मा  नहीं बचा सकता है ,ऐसे मुर्ख ब्यक्ति को तो केवल भगवान् की श्री कृपा ही बचा सकती है । ऐसा मुर्ख ब्यक्ति जीते हुए भी  मर मर कर जीता है और चरम दुःख को प्राप्त होता है. 

इसीलिए भगवान् ने कहा है की सोच समझकर ही आचरण करना चाहिए। अर्थात ज्ञानियों जैसा आचरण करना चाहिए। और ज्ञानियों जैसा आचरण आप ज्ञान प्राप्त करके ही कर सकते है ,और आचरण का ज्ञान , धर्म का ज्ञान प्राप्त करने से ही आता है। परन्तु सवाल अब यह उठता है की हमें धर्म का ज्ञान प्राप्त कैसे होगा ?

इसका उतर सरल है ,धर्म का ज्ञान हमें धार्मिक किताबो के अध्धयन से मिलेगा। 

तो क्या  केवल धार्मिक किताबी के अध्यन से हमें धर्म का ज्ञान हो जायेगा और हम ज्ञानियों की तरह आचरण करने लगेंगे ,इसका उत्तर है नहीं ,केवल धार्मिक  किताबो  के अध्ययन से आप  ज्ञानी नहीं हो सकते ,ज्ञानी होने के लिए धार्मिक किताबो के अध्यन के साथ साथ आपको उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारकर वैसा ही आचरण करना होगा। तब जाकर आप ज्ञानी बनेंगे और फिर इसी ज्ञान और आचरण से आपका उद्धार होगा और आप बार बार जीने - मरने के सिस्टम  (प्रोसेस) से मुक्ति पा सकेंगे इसी को अध्यात्म की भाषा में  मोक्ष कहा गया है और साधारण भाषा में  "अमर हो जाना " कहा गया है। 

आजकल हर कोई अमर होना चाहता है ,भगवान् ने अमर होने का उपाय भी बताया है लेकिन कोई उस पर चलना नहीं चाहता है। सवाल यह उठता है की जब सब कुछ भगवान् ने उपलब्ध ही करा दी है तो लोग इसे करते क्यों  नहीं और करके अमर क्यों  नहीं हो जातें है ?

इसका उत्तर यही है की इस अमरत्व की प्राप्ति वाले पर चलना कठिन है ,और आज के ज़माने कोई कठिन हुए टेढ़ा-मेढ़ा काम नहीं करना चाहता है ,हर कोई हर समय मज़ा और आराम वाला ही काम करना चाहता है ,जबकि अमरत्व प्राप्त करने वाला रास्ता काफी कठिन है ,इस रास्ते पर चलने का मतलब तो बस यही समझिये की सुख तो भूल ही जाइये , इस कठिन रास्ते पर चलना तप के सामान है ,और इसी तप के तप से ही ब्यक्ति को अमरत्व मिलता है जिसको की आधात्म कीभाषा  में मोक्ष कहते है। 

तप करने वाला कोई साधारण ब्यक्ति नहीं होता वह एकदम आसाधारण ब्यक्ति होता है. वह एकदम साहसी ब्यक्तित्व वाला होता है. वैसे तप के शुरुआत के समय वह भी साधारण ही ब्यक्ति होता है किन्तु जैसे जैसे वह तप की यात्रा  पर  आगे बढ़ता है वैसे-वैसे वह साधारण से असाधारण ब्यक्तित्व वाला होने लगता है और यत्र पूरी होने पर उसे अमरत्व प्राप्त होता है .

अब यह तप कैसे करें इसकी चर्च हम आगे करेंगे। फिलहाल के लिए इतना समझिये की तप करने का मतलब-


वन चले  जाना 

पीला या ऑरेंज कलर का वस्त्र धारण करना 

माला धारण करना 

मोटे   तिलक लगाना 

केवल आँखें बंद करके बैठे रहना 

दिनभर धुप में काम करना 

बिज़नेस में दिन रात  मेहनत करना 


उपुक्त में  से कोई भी  तप नहीं है यह सब भ्रम है और समाज में इसी  भ्रम का ब्यापक विस्तार भी है इसे भी नाकारा नहीं जा सकता ,और इस भ्रम में साधारण जन लोग फसे हुए है यह भी एकदम सत्य है। तप क्या है ? तप कैसे है ?तप क्यों है इसका ब्यापक उत्तर आपको आगे मिलेगा ,फिलहाल के लिए इतना जानिये की  उपुक्त जो बातें है  उनका तप से कोई मतलब नहीं है। 

कुछ लोग दान इसलिए देते है की क्योकि उनके पास धन ज्यादा रहता है। यहाँ पर प्रश्न  यह उठता है की क्या उसके पास यदि ज्यादा धन नहीं रहता तो वह दान नहीं देता या किसी के पास यदि ज्यादा धन रहे तभी दान देना चाहिए। एक और प्रश्न यह भी उठता है की क्या केवल धन का दान ही दान है ?यदि धन का दान देना ही दान है तो फिर दरिद्र ब्यक्ति तो कभी दान दे ही नहीं पायेगा ?और जब दरिद्र बयक्ति कभी दान दे ही नहीं पायेगा तो कभी पुण्य कर ही नहीं पायेगा और जब पुण्य कर्म करेगा ही नहीं तो उसे अमरत्व की प्राप्ति कैसे होगी अर्थात वह कैसे अमर होगा ? तो क्या इसका उत्तर यह हुआ की अमर होने का सौभाग्य केवल धनि लोगो को है गरीब और दरिद्र लोगो को नहीं। आगे प्रश्न यह भी उठता है की यदि अमरत्व केवल धनि लोगो के लिए है तो फिर भगवान् यह क्यों कहते है की मै सबके साथ बराबर का भाव रखता हु अर्थात समभाव का भाव रखता हु ?


इस तरह के तमाम प्रश्न उठते है। 

यहाँ हम प्रत्येक  चीज़ो का उत्तर एक एक करके देखते है। 

सबसे पहले यह जानते है की क्या धन का दान  ही दान है और इसे देने वाला ही क्या दानी और पुण्यात्मा है ?  तो उत्तर है नहीं, अर्थात धन का दान   एक दान है यह हो सकता है लेकिन यही एक दान है और इसके आलावा कोई दूसरा दान नहीं है ,ऐसी  सोच और धारणा  एकदम गलत है। और धन ही सबसे बड़ा दान है इससे बड़ा कोई दान नहीं  यह भी गलत सोच और  धारणा का ही तथ्य है। 


दान की कोई सीमा नहीं होती है, दान आप किसी भी चीज का दे सकते हैं, बशर्ते लेने वाला उसे स्वीकार करें. अर्थात जो आप दान किसी को दे रहे हैं उसे वह मन भाए. यह ठीक उसी तरह है, की भूख प्यास से परेशान  किसी व्यक्ति को खाने के लिए भोजन चाहिए लेकिन उसे आप खाने की जगह कपड़े दे रहे तो फिर यह दान उतना प्रभावकारी सिद्ध नहीं होता जितना होना चाहिए . 

ऐसा भी नहीं है कि दान देने वाले को यह पता नहीं है कि भिक्षा मांगने वाला को चाहिए क्या ? उसे पता है कि भिक्षा मांगने वाले को भोजन ही चाहिए फिर भी वह कपड़े दे रहा है. 

हां अगर भिक्षा मांगने वाला भोजन नहीं मांग रहा है तब आप उसे कुछ भी दे सकते हैं जो देने लायक हो और उसके लेने लायक हो . 


अतः कोई मिलाजुला कर यह समझा जा सकता है कि दान में केवल धन ही नहीं दिया जाता है बल्कि आप सारी चीजें दे सकते हैं. 

जैसे- वस्त्र, अन्न, धन , सोना - चांदी , हीरे- जवाहरात , जमीन, अपनी कोई अपनी वस्तु..... इत्यादि . 

यहां तक कि ना दिखने वाली चीजों को भी आप दान के रुप में तेज सकते हैं, जैसे कि- ज्ञान का दान, विद्या का दान...... इत्यादि. 


इस तरह से देखा जाए तो दान की कोई सीमा नहीं है. आप किसी भी व्यक्ति की जरूरत के अनुसार कुछ भी चीजें दान में दे सकते हैं. 



क्या दान किसी को भी दे देनी चाहिए - 


 छोटी मोटी चीजों को आप दान में यूं ही दे सकते हैं. लेकिन जहां अमूल्य वस्तुएं और बड़ी वस्तुओं को दान में देना हो तो दान में देने से पहले दान लेने वाले की स्थिति पर भी विचार कर लेनी चाहिए. और किसी गुणकारी और सज्जन व्यक्ति को ही उसे दान में देना चाहिए. क्योंकि मांगने वाला कुछ भी मांग सकता है लेकिन देने वाले को यह सोचना चाहिए कि मांगने वाला जो मांग रहा है वास्तव में वह उसके योग्य भी है या नहीं. 


ज्यादातर लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं और कह देते हैं कि भाई हमारा काम तो था उसे दान देना हमने दे दिया अब वह अच्छा करें या खराब इससे हमें कोई मतलब नहीं है यह उसकी मर्जी है. कुछ लोग तो यह भी कह देते हैं कि हमने दान दे दिया वह अच्छा करें या खराब यह सब भगवान की मर्जी है. यह सब बातें सुनने में सही भी लगती हैं. लेकिन वास्तव में यह सही नहीं होती हैं. 


क्योंकि अभी अभी आपने ऊपर  पड़ा की मांगने वाला कुछ भी मांग सकता है लेकिन देने वाला का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है कि वह जांच परीक्षण करके ही किसी को कुछ दान दे खास करके उन समय जब दान वाली चीज है अनमोल हो. 


यह कहानी सुनिए- एक बार एक व्यक्ति 3-4 पशुओं को अपनी साथ लेकर कहीं जा रहा था , रास्ते में चलते चलते वह थक गया , फिर उसने सोचा क्यों ना आराम कर लू . तभी उसे एक पेड़ दिखाई दिया वह पेड़ काफी छायादार था वह उस पेड़ के नीचे बैठ गया और उस पेड़ के बगल में ही जानवरों को भी बांध दिया रस्सी से. 

और वही आराम करने लगा, आराम करते करते उसे अचानक भूख का एहसास हुआ, लेकिन उसके पास खाने के लिए कुछ था ही नहीं, इसलिए उसने अगल-बगल देखा, तभी उसे अचानक एक घर दिखाई दिया, वह उस घर को गया, और दरवाजा खटखटाया, दरवाजा खटखटाआते ही एक युवक बाहर निकल कर आया और पूछा कि क्या बात है. तभी उस राही ने उत्तर दिया- कि भाई मैं रास्ता चलते चलते थक गया हूं और मुझे खाने के लिए कुछ चाहिए अगर कुछ है तो दे दो. 


उस व्यक्ति ने उसे थका हारा देख उसको खाने के लिए दे दिया और साथ में उसे रास्ते में भी खाने के लिए कुछ पोटली बनाकर दे दी. खाना लेने के बाद राही उस पेड़ के नीचे आ गया और खाना खाने लगा और खाना खाने के बाद वह फिर आराम करने लगा , फिर थोड़ी देर बाद जब उसकी नींद टूटी, तो वह पशुओं को खोल कर आगे ले जाने लगा. और जब वह थक जाता तो वह कहीं आराम करने लगता. उसे  रास्ते में खाने के लिए भी मिल गया था इसलिए जहां भी उसे भूख लगती है वह कुछ खा लेता. 

फिर जैसे नहीं तैसे वह अपनी मंजिल की तरफ पहुंच गया. मंजिल की तरफ पहुंचने के बाद उसने चारों पशुओं को बांध दिया, और गढ़ासे से सभी पशुओं को काट डाला. 

और बस यही कहानी का अंत हो जाता है. 


आप लोग सोच रहे होंगे कि इसमें खास बात क्या है. इसका उत्तर यह है कि जिस व्यक्ति को दान दिया गया अन्न का वह व्यक्ति उस दान के योग्य नहीं था क्योंकि वह अच्छा इंसान नहीं था उसके मनोभाव अच्छे नहीं थे और इरादे भी अच्छे नहीं थे क्योंकि अगर उसकी राधे अच्छे होते तो वह जीवो की हत्या नहीं करता, जिस व्यक्ति ने उसे खाने के लिए अन्य दिया ,उसी अन्न का सेवन कर कर उसने ऊर्जा प्राप्त की और उसी ऊर्जा के बलबूते वह अपने मंजिल तक पहुंचा और पाप से परिपूर्ण काम को अंजाम दिया . 

अगर उस व्यक्ति ने उसे खाने का आनंद नहीं दिया होता तो वह अपनी मंजिल तक ठीक से पहुंच ही नहीं पाता. इसलिए हत्या करने वाला वह व्यक्ति पापी तो है ही साथ में वह व्यक्ति भी कम दोषी नहीं है जिसने उस पाप में अपना योगदान दिया अर्थात जिसने अन्न का दान दिया. 

इसीलिए कहा गया है कि मांगने वाला कुछ भी मांग सकता है लेकिन देने वाले को चाहिए कि अच्छी तरह चीजों को पढ़कर ही दान दें. अपने मन बुद्धि का प्रयोग करते हुए पहले अच्छी प्रकार से जांच लिए दान लेने वाला वाकई में उस दान की योग्य है भी या नहीं वह सज्जन है या दुराचारी इसका परीक्षण करते हुए ही दान दें. 

अगर मान लीजिए कि आप किसी व्यक्ति को आपने अंतःकिरण या मन बुद्धि से जानना चाहते हैं फिर भी उसके मनोभाव को नहीं समझ पाए और गलती वस आपने उसे दान दे दिया और अगर वह व्यक्ति  उस दान का गलत प्रयोग करता है तो उसी स्थिति में आप किसी भी प्रकार के दोषी नहीं है क्योंकि आपने उसे अपने मन बुद्धि का प्रयोग करते हुए उसके मनोभाव को जानने की कोशिश की यह अलग बात है कि आप उसे पूरी तरह से चांद नहीं पाए लेकिन आपने प्रयास तो किया ही. और प्रयास करने के बावजूद भी अगर गलती हो जाए तो वह आपकी गलती नहीं मानी जाएगी. 


इसीलिए मन बुद्धि का प्रयोग करते हुए अच्छी प्रकार परीक्षण करते हुए ही दान देना चाहिए ताकि आपका दान सफल हो ना कि निष्फल हो जाए. क्योंकि सफल दान ही आपको पुण्य का  भागीदारी बनाएगा जबकि निष्फल दान आपको पाप का भागीदारी बनाएगा . इसलिए अगली बार जब भी आप दान देने जाएं तो सावधान रहें कहां


जब भी आप दान देने जाते हैं तो मन से आवाज निकलती ही है कि वास्तव में  इसे दान देना चाहिए या नहीं देना चाहिए . उस आवाज को भलीभांति समझे और निर्णय लें. आगे भगवान प्रभु पर सब छोड़ दीजिए क्योंकि भगवान सबके मनोभाव  को अच्छी तरह समझते हैं. 


किस दान से क्या फायदा होता है- 


ज्यादातर हम चीजों को दान में दे देते हैं और हमें पता भी नहीं चलता है कि किस् दान से हमें क्या फायदा मिलता है. अब दान फायदा देख कर भी नहीं करनी चाहिए बस इसे कर देनी चाहिए बुद्धि विवेक का परीक्षण करते हुए. अर्थात जिसे दान दें दान देने के लिए योग्य भी हो और सज्जन भी हो . 

आइए जानते हैं कि किस्तान से हमें क्या फायदा मिलता है 


अन्न का दान देने से हमें अक्षय सुख मिलता है 

तिल दान से हमें अभीष्ट संतान की प्राप्ति होती है 

स्वर्णा दान से दीर्घायु प्राप्त होती है 

दीपदान से हमें उत्तम नेत्र प्राप्त होता है 

गृह दान से उत्तम भवन प्राप्त होता है 

रजत दान से हमें उत्तम रूप की प्राप्ति होती है 

वस्त्र दान करने से चंद्रलोक की प्राप्ति होती है 

अश्व दान करने से अश्विनी लोक की प्राप्ति होती है 

इंधन का दान करने से व्यक्ति अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है


रोगियों को दान कैसे दें- 

आपने बहुत तरह  की  दान सुने होंगे जैसे विद्या का दान, ज्ञान का दान, धन का दान, वस्त्र का दान......... इत्यादि. लेकिन सेवा का भी दान होता है इस पर ध्यान बहुत ही कम लोग का जाता है या यूं समझे कि नहीं से भी नहीं के बराबर जाता है. क्योंकि सेवा का दान ऐसा लगता है जैसे कोई दान है ही नहीं लेकिन ऐसा है नहीं. सेवा का दान भी बहुत बड़ा दांत माना जाता है. सेवा के दान को ही श्रमदान भी कहते हैं. श्रमदान का मतलबी हो गया - 


श्रम+ दान 


अर्थात सेवा वाला दान. यह सेवा वाला दान आपको कहीं भी करने को मिल जाता है. इसी को इंग्लिश में सर्विस वाला भी दान कहते हैं. मतलब किसी के लिए कुछ कर दो लेकिन बदले में उससे कुछ ना लो वही है सेवा का दान. 

उदाहरण के तौर पर इसे ऐसे समझा जा सकता है- जैसे कोई  रोगी बहुत ही बीमार है, और आप उसके लिए दिन और रात सेवा कर रहे हैं, उसे जो चाहिए उसे लाकर दे रहे, दवाइयां लाकर दे रहे, खाने पीने का सामान लाकर दे रहे हैं. उसका दवाई दर्पण करवा रहे हैं, मतलब एक रोगी की जितनी भी जरूरत होती है उतनी जरूरत लगभग पूरा कर रहे, और उसके बदले में आप कुछ नहीं ले रहे हैं तो इसे ही सेवा का दान कहा जाता है. सेवा का दान अत्यंत पूर्ण दान में से एक माना जाता है. यह अत्यंत ही प्रभाव कारी और पूरे कारी दान है. 


रोगियों को सेवा दान देने से फायदा- 


रोगियों के लिए औषधि, तेल, भोजन तथा दूसरे अन्य प्रकार की सुविधा देने वाला मनुष्य कभी बीमार नहीं होता है या यू का लिंक जल्दी बीमार नहीं पड़ता है तथा वह सेवा का दान देने वाला मनुष्य रोगरहित , सुखी तथा दीर्घायु होकर जीवन जीता है . 

इसलिए आपने अधिकतर अपने नेचर में देखा होगा कि जो लोग रोगियों की अधिकतर सेवा करते रहते हैं और वह साधारण तौर पर बीमार नहीं पड़ते बहुत ही कम ऐसा देखा गया है कि वह बीमार रहे जैसा कि साधारण पुरुषों के साथ होता है. 


इसलिए आप चाहते हैं कि अपने जीवन में आप रोग रहित रहे बार-बार बीमार ना पड़े, तो आप अपने घर परिवार मैं, रिश्तेदारों मे, पास पड़ोस मे, यह जरूरतमंद रोगियों की सेवा करके आप निरोगी बन सकते हैं और जीवन का आनंद उठा सकते हैं. रोगियों की सेवा करने से आपको रोगियों से आशीर्वाद पुण्य कर्म के रूप में मिल जाता है, जिससे आप बीमार नहीं पड़ते और स्वस्थ जीवन जीते हैं. 


इस आर्टिकल में आपने जाना कि दान क्या चीज है इसे कैसे देना चाहिए ? क्यों देना चाहिए और क्यों नहीं देना चाहिए ? दान देने से क्या क्या फायदे होते हैं ? किस  तरह के फायदे होते हैं ? इस तरह की तमाम बातों का उत्तर आपने जाना. आशा करते हैं कि अब आप को दान देने से कोई भी उलझन नहीं होगी. यह सभी बातें गीता के अध्ययन से ली गई हैं अगर आप भी अपने ज्ञान का विकास करना चाहते हैं तो गीता पढ़ते रहें ताकि आप भी ज्ञानी हो सके और ब्राम्हण हो सके , क्योंकि गीता का ज्ञान और उसे आचरण करने वाला ही ब्राह्मण माना जाता है किसी जात से इसका कोई लेना देना नहीं है. 


इस पोस्ट को अपने मित्रों के पास जरूर जरूर से शेयर करें ताकि दान की गुणवत्ता और विधि को अन्य लोग भी जान सके, और ज्ञान प्राप्त करके अपना तथा अपने चाहने वालों का उद्धार स्वयं कर सके.





 




एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ