यह ज्ञान किसी भी युवक - युवती के लिए जरुरी है - Top Inspirational Motivational Facts Story



 आम अमरूद इत्यादि के केवल सबूत फली ठाकुर जी के भोग में लगाए जाते हैं कौवे आदि के द्वारा काटा हुआ दागी फल ना तो देव पूजा में आ सकता है और ना ही ब्राह्मण अपने कार्यों में लगा सकते हैं 

उसी प्रकार पवित्र हृदय बालकों या युवकों को ही धर्म पर पर लाने की प्रयास करनी चाहिए जिस पुरुष के हृदय में एक बार भी कामवासना प्रवेश कर गई है उसका धर्म पथ पर चलना बहुत ही कठिन हो जाता है . 

क्योंकि पहले की जो मधुर आदतें होती हैं जो क्षणिक होती हैं इंसान को बहुत ही परेशान करती है और वह चाह कर भी उन्हें छोड़ नहीं पाता है इसीलिए उसका धर्म पथ पर चलना कठिन हो जाता है. 













जबकि बालों को का मन शुद्ध और पवित्र होता है और उनका मन गीली मिट्टी के समान होता है जिस प्रकार गीली मिट्टी को मोड़ कर कुछ भी बनाया जा सकता है और उसे तपा कर एकदम कठोर बनाया जा सकता है उसी प्रकार पवित्र हृदय वाले बालकों को धर्म पथ के मार्ग पर आसानी से चलाया जा सकता है. 


कहते हैं कि बालकों के मन में भगवान रहते हैं. उनके मन की प्रकृति फूल के समान कोमल होती है जिस प्रकार फूल को दिखने पर कोमलता का भाव आता है उनको देखने पर भी वैसा ही भाव मन में जागृत होता है 

बस देखने वाले की नजर सुंदर होनी चाहिए जब खुद की नजर सुंदर नहीं रहेगी तो कुछ भी आप अच्छा नहीं देख पाएंगे और अच्छी चीजों में आप खराब ही देखने की कोशिश करेंगे अतः इसीलिए कहा जा रहा है कि खुद की नजर अच्छी होनी चाहिए. 


किसी भी बालक का मन पूर्णत: उसके पास रहता है वह किसी प्रकार से विभाजित नहीं होता है किंतु जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है कि मन में तमाम तरह के विचार बहुत ही तेजी से आने लगते हैं और वह इन विचारों के बहाव में बहता चला जाता है और इसी से उसका पतन होना शुरू हो जाता है , यू समझे कि वह अंदर से टूट बिखर जाता है . जिसका असर उसके शरीर पर भी पड़ता है. अतः विचारों को कंट्रोल में करना बहुत ही जरूरी है लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है जितना इसे हम समझ रहे हैं यह अत्यंत ही कठिन काम है या किसी एक दिन के प्रयास से संभव नहीं हो सकता है. 



इसके लिए हमें निरंतर प्रयास करना होगा और प्रत्येक दिन करना होगा हर महीने करना होगा हर साल करना होगा तब जाकर ये कंट्रोल में आएगा क्योंकि यह 1 दिन में तुरंत से कंट्रोल में नहीं आ जाएगा , के लिए आपको अथक प्रयास करना होगा ठीक उसी तरह प्रयास करना होगा जैसे मरने वाला अपनी जिंदगी के लिए प्रयास करता है. 

इसको मैं एक कहानी से आप लोगों को समझाने की कोशिश करता हूं. 


एक युवती रस्सी से कूड़े की बाल्टी को खींच रही थी, अब तो गांव में अधिकतर देखा गया है कि कुवे होते ही है वैसे दिन पर दिन कुए की संख्या घटती जा रही है क्योंकि जमाना मॉडर्न हो रहा है फिर भी आपको कहीं ना कहीं कोई देखने को मिल ही जाए खास करके गांव के इलाकों में. तो अब हम आगे बढ़ते हैं और कहानी को पूरा जानते हैं, तो युवती जब रस्सी खींच रही थी तो उस रस्सी से कुए की जो किनारा होती है जो पत्थर का बना होता है वह रगड़ा जा रहा था शुरु शुरु में तो इसका असर उस पत्थर पर नहीं दिखा लेकिन लंबे समय तक के बाद यानी साल 2 साल बाद जब देखा गया तो पाया गया कि वह पत्थर कट गया है वैसे तो यह देखने में बड़ी साधारण बात लगती है. 



लेकिन अगर इसका ठीक से मतलब समझा जाए अपने दैनिक जीवन में तो हम इससे बहुत ही अच्छे अच्छे मतलब निकाल सकते हैं , जैसे अगर हम नियमित रूप से कठिन परिश्रम करें तो हम महान से महान कार्य कर सकते हैं क्योंकि जब रस्सी पत्थर को काट सकती है तो नियमित मेहनत करके हम लोग भी बड़े से बड़ा काम कर सकते हैं. इस तरह की बहुत सारी बातें हम उपयुक्त कहानी से जोड़कर समझ सकते हैं, 



उपयुक्त कहानी में हमने बात किया था कि हम मन को कंट्रोल में करने का उपाय जानना चाह रहे हैं और उसी के लिए हमने कुए वाली कहानी सुनाई थी और साथ में यह भी कहा था कि मन को कंट्रोल में करना इतना भी आसान नहीं है जितना कि कहा जाता है या सुना जाता है लेकिन अगर हम नियमित रूप से उसी तरह प्रयास करें जैसे कि हमने रस्सी से पत्थर काटने का प्रयास किया था वह भी बिना दिमाग लगाए मतलब यह सब तो अनजाने में हो गया था लेकिन अगर हम नियमित रूप से प्रयास करें तो हम अपने मन को कंट्रोल में कर सकते हैं और तमाम प्रकार की बुरी आदतें  जो हमारे अंदर चलती हैं उन्हें हम बहुत ही आसानी से रोक सकते हैं और सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं तथा एक अच्छा जीवन भी जी सकते हैं, 




क्योंकि जब रस्सी पत्थर को काट सकता है नियमित प्रयास करके तो हम लोग चाहे कितने भी मानसिक रूप से कमजोर क्यों ना हो अगर नियमित प्रयास करें तो हम लोग भी मानसिक रूप से सबल बन सकते हैं यहां सबल बनने का मतलब मजबूती से है . 




गौतम बुद्ध ने कहा था कि मनसा वाचा कर्मणा अर्थात अच्छे चाहे बुरे विचार पहले मन में आते हैं फिर जीभ पर आता है और फिर धीरे-धीरे उसका जीवन में समाविष्ट हो जाता है . तो कहने का मतलब यही हुआ अच्छा अच्छा खराब विचार पहले मन में आता है कि धीरे-धीरे आप उसे बोलने लगते हैं अर्थात व जीव पर आ जाता है और फिर अगर यही आदतें रहती है तो वह आचरण में चला आता है और जीवन में समाविष्ट हो जाता है. 


इसलिए हमें अपनी खराब आदतों को शुरू में ही छोड़ देनी चाहिए और अच्छी आदतें जल्द से जल्द पकड़ लेनी चाहिए वह भी बहुत ही मजबूती के साथ, याद रखिएगा अगर आप मानसिक रूप से सुंदर है सफल है तभी आप अपने जीवन को सुंदर और अच्छा बना सकते हैं जब आप अपने जीवन को सुंदर और अच्छा बनाएंगे तभी आप अपने परिवार के लोगों को भी सुंदर और अच्छा बनाएंगे और उन्हें सुख सुविधाएं प्रदान कर सकेंगे . 



अच्छी आदतों का मतलब यहां पर धर्म ग्रंथ से है याद रखिएगा धर्म ग्रंथ में वह सभी बातें लिखी रहती हैं जो हम जानना चाहते हैं आपको सभी उत्तर वहां से मिल जाएगा. अभी केवल धर्म ग्रंथ भी एक अच्छा आदत होता है दूसरी अन्य आदतें भी होती हैं लेकिन यहां पर मैं प्राथमिकता धर्म ग्रंथ को ही दे रहा हूं क्योंकि धर्म ग्रंथ में पूरे जीवन का निचोड़ मिलता है क्या सही है क्या गलत आपको धर्म ग्रंथ से ही मिलता है उदाहरण के तौर पर अगर गीता को पढ़ा जाए तो गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सारी चीजें लिख दी है कि इंसान का क्या जीवन होना चाहिए उसका क्या व्यवहार होना चाहिए लेकिन अज्ञातवास लोग उसे पढ़ते ही नहीं है और परेशान रहते हैं और केवल वे अपने नेचर में जो चीजें घटती रहती हैं उनसे ही सीखते रहते अपने पास पड़ोसियों से सीखते रहते हैं जिनको कुछ उतना पता नहीं रहता है और इसी तरह से नॉलेज का क्रम आगे बढ़ता रहता है, लोग एक दूसरे से ही सीख रहे हैं और गलत चीजें ही ज्यादा सीख रहे हैं. 



एक दूसरे से सीखना कभी खराब नहीं माना जाता है खास करके अगर व्यवहारिक जीवन की ज्ञान की बात करें तब लेकिन एक दूसरे को पता भी तो होना चाहिए कि वाकई में सही चीज क्या है क्या है सही ज्ञान, उल्टा सीधा चीज़ एक दूसरे को ट्रांसफर करना ज्ञान के रूप में कभी भी सही नहीं है, क्योंकि इससे न केवल किसी एक दो लोग का पतन होगा बल्कि बहुत ज्यादा लोगों का पतन हो जाता है क्योंकि यह ज्ञान ट्रांसफर होता चला जाता है और दिन पर दिन एक बड़े रूप में ट्रांसफर होता है जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं अतः सभी चीजों को ही ट्रांसफर करें ताकि आपका भी भला हो और दूसरे का भी भला हो. और सही चीज से अब तक भी ट्रांसफर कर पाएंगे जब आपको सही चीज पता और आपको सही चीज पता सही जगह सही चल सकती है और उस सही जगह क्या है जो है धर्म ग्रंथ और वह धर्म ग्रंथ है भगवत गीता. 



किसे दान देना चाहिए कब दान देना चाहिए किस स्थिति में दान देना चाहिए, संपत्ति क्या है स्वास्थ्य संपत्ति क्या है मुद्रा की संपत्ति क्या है ज्ञान की संपत्ति क्या है भक्ति की संपत्ति क्या है देव संपत्ति क्या है, अपने से बड़ों के साथ क्या व्यवहार करना चाहिए माता पिता के साथ कैसा व्यवहार रखें ,माता-पिता जब अच्छे ना हो दुराचारी हो फिर भी उनके साथ किस तरह का व्यवहार रखना चाहिए , अपने लिए ज्यादा सोचना चाहिए या अपने से जुड़े लोगों के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए, अपना ज्यादा ध्यान रखें या अपने परिवार का ज्यादा ध्यान रखें, खुद को समस्या में डाल कर अपने परिवार का उत्थान करें इस तरह की तमाम बातों का उत्तर आपको गीता में मिलेगा यह सब तो मैंने ऊपर केवल एक उदाहरण के तौर पर बताया है ताकि आप लोगों को गीता का मतलब और उसका जिंदगी में क्या प्रभाव है वह समझ में आ जाए . 


 यकीन मानिए मैं कोई गीता का बहुत बड़ा शौकीन नहीं था बस मैं यह उसे पढ़ना नहीं चाहता था लेकिन जब वास्तव में पड़ा तब लगा कि मेरा फिजिक्स ,केमिस्ट्री ,मैथ और बायोलॉजी का ज्ञान भी ढीला पड़ गया क्योंकि उसे समझने के लिए आपको बहुत ही ज्यादा ब्रेन लगाना पड़ेगा लॉजिक पर लॉजिक उस पर सेट है और वह सब तभी समझ में आएगा जब आप बहुत ज्यादा एनर्जी तथा माइंड उस पर लगाएंगे . 



आप कई बार उसे पड़ेंगे तब जाकर उसके भाव सही से आपको समझ में आएंगे, ऐसा नहीं है कि सारी चीजें संस्कृत में लिखी गई है और उसका कोई हिंदी में व्याख्या नहीं है सारे संस्कृत के  श्लोक लिखे गए हैं उसको हिंदी में व्याख्या करकर समझाया गया है लेकिन वह इतना घुमाओ फिराव और लॉजिक के साथ है कि वह हिंदी का व्याख्या आपको तुरंत समझ में नहीं आएगा जब से उसे आप कई बार पड़ेंगे नहीं . 



पहली बार जब मैंने गीता को पढ़ने की सोचा था तो मन ही मन में सोचा कि अरे यार उसमें तो संस्कृत लिखा रहता है वह संस्कृत में कैसे समझूंगा मैं तो साइंस का स्टूडेंट हूं . लेकिन जब खोलकर देखा तो उसमें हिंदी व्याख्या लिखा हुआ था फिर मन में कुछ विश्वास आया कि चलो अब तो कैसे भी करके समझ ही लूंगा चाहे कितना भी कठिन हो, 



तो अगर आपको मानसिक रूप से सबल बनना है चीजों को अच्छी तरह से सीखना है तो भगवान श्री कृष्ण द्वारा लिखे गए उस गीता को जरूर पढ़ें, और हो सकता है कि पहली बार में वह आपको पसंद ना आए लेकिन थोड़ा समय दीजिए धीरे-धीरे वह जरूर आपको अच्छा लगने लगेगा यह मेरा पूर्णता विश्वास है और आप असीम ज्ञानी बन जाएंगे, जब आप असीम ज्ञानी बन जाएंगे तब आप दुख से भी दूर हो जाएंगे क्योंकि संसार में जो दुख है उस दुख का एक ही मात्र कारण है वह है अज्ञान शेष दुख तो केवल छाया मात्र ही रहता है . 



जैसे ही हमने अज्ञान का नाम लिया ज्यादातर लोगों को बड़ा बुरा लगा होगा उन लोगों ने जरूर यह सोचा होगा कि अरे हम तो प्रोफेसर हैं ,हम तो डॉक्टर हैं ,हम तो इंजीनियर है ,हम तो इतनी बड़ी कंपनी में काम करते हैं हमारे पास तो इतना मंथली इनकम आता है  हम कैसे अज्ञानी हो गए हम तो ज्ञानी हैं अरे इसमें क्या पोस्ट लिख दिया गया है ऐसा जरूर यह सोचते होंगे , अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आपने जो टैलेंट हासिल किया है वह कमर्शियल टैलेंट है जिसमें बहुत थोड़ा सा अंश व्यवहारिक है और साइंस से रिलेटेड है , आपको असली चीज तो अभी पता ही नहीं है, असली चीज आपको तभी पता होगी जब आप गीता पढ़ेंगे , उसको पढ़ने के बाद ही पता चलेगा कि आप वास्तव में अज्ञानी है या मूर्ख है या अज्ञानी मूर्ख दोनों ही है, 



दरअसल ज्ञान का कोई अंत नहीं है यह अनंत है लेकिन जैसे ही कोई यह मान लेता है कि वह बहुत बड़ा ज्ञानी है तू वह अपने आप को सीमित कर लेता है और जब वह सीमित कर लेता है तब उसे पता ही नहीं चलता है कि कहां ज्ञान है और कहां अज्ञान कितना ज्ञान है और कितना अज्ञान है . 


बाल अवस्था में बच्चों का मन अपने पास रहता है शुरू में हमने यह बात कही थी आगे अगर इसी बात को हम आगे बढ़ाते हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि बच्चा जब युवा होता है तो उसके मन में तरह-तरह की विचार आने लगते हैं , जो अच्छे भी होते हैं और बुरे भी होते हैं जिस पर हमने पहले ही चर्चा कर दिया है, जब यह बच्चा युवा हो जाता है पूर्णता तो इसकी शादी हो जाती है, 



विवाह हो जाने पर युवा का मन स्त्री के पास चला जाता है संतान होने पर इसका मन और बट जाता है . 

विवाह होने पर उस युवा का मन अपनी पत्नी के पास 50 परसेंट फिक्स हो जाता है तथा अपने बच्चों के पास 25% फिक्स हो जाता है , तो कुल मिलाकर अगर समझा जाए तो 75 परसेंट उस युवा व्यक्ति का दिमाग अब फिक्स हो गया है जो पहले बच्चा था . और मात्र 25 परसेंट में वह दुनियादारी देखता है. 

यही युवा जब बच्चा था तब इसका दिमाग पूर्णता इसके  पास था कोई दिमाग का बंटवारा नहीं हुआ था लेकिन अब इसके पास मात्र 25 परसेंट ही बच गया है अर्थात दिमाग का एक चौथाई सही बच गया है जिसमें वह दुनियादारी के साथ-साथ अपना भी कुछ सोच लेता है . 


इसीलिए हमने कहा था कि बालों को का मन बहुत ही पवित्र शुद्ध और गीली मिट्टी के समान होता है जिसे हम कोई भी रूप दे सकते हैं जबकि एक युवा और वृद्ध व्यक्ति के मन में तमाम तरह की अशुद्धि रहती है जिसे धर्म पद पर चलाना बहुत ही कठिन हो जाता है , इसीलिए कहा गया है कि जितनी अच्छी आदतें हम सीख सकते हैं हमें बहुत पहले ही सीख लेनी चाहिए और बुराई को बहुत पहले ही छोड़ देनी चाहिए और अच्छी आदतें हमें धर्म पथ पर चलकर ही मिल सकता है और धर्म पथ पर हम तभी चल सकते हैं जब हमें धर्म का ज्ञान हो और धर्म का ज्ञान हमें अच्छी जगहों से ही मिलेगा और वह अच्छी जगह है हमारा धर्म ग्रंथ जोकि है हमारा भगवत गीता. 



यह पोस्ट हमने अपने सभी छात्र बंधुओं अपने गांव के निवासियों और सभी भारत के युवाओं ,वृद्ध और बच्चों के लिए लिखा है ताकि इसको पढ़कर सभी का एक उच्च और पवित्र विकास हो सके और उनका जीवन सुखमय हो सके. 


🙏जय श्री राम , 🙏जय श्री सीताराम , 🙏जय श्री राधे कृष्ण , 🙏जय श्री लक्ष्मी नारायण, 🙏जय श्री शिव पार्वती, जय श्री भवानी माई, 🙏जय श्री दुर्गा माई, 🙏जय श्री काली माई, 🙏जय श्री सीता माई, 🙏जय श्री लक्ष्मी माई, 🙏हर हर महादेव 🌹

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